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अमेठी।
मनुष्य का जीवन तभी सार्थक होता है, जब वह आत्मबोध को प्राप्त करता है। आत्मबोध का अर्थ अपनी आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझना और यह अनुभव करना है कि हमारी सत्ता परमात्मा का अंश है। आत्मा मूलतः शुद्ध, निर्मल और दिव्य है, लेकिन वासना, स्वार्थ और लोभ की धूल उसके तेज को ढक देती है। इस आवरण को हटाना ही साधना का पहला चरण है।
यह विचार गायत्री शक्तिपीठ अमेठी में चल रहे चालीस दिवसीय गायत्री महापुरुश्चरण के सोलहवें दिन पूजन-अर्चन के दौरान साधिका कुसुम शर्मा ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि संयमित आचरण, सात्विक आहार-विहार, पवित्र चिंतन और निस्वार्थ सेवा ऐसे साधन हैं, जिनके माध्यम से आत्मा पुनः उज्ज्वल होती है और व्यक्ति आत्मशुद्धि की ओर अग्रसर होता है।उन्होंने कहा कि साधना के बिना ईश्वर का साक्षात्कार संभव नहीं। शुद्ध शरीर, निर्मल मन और पवित्र विचार ही सच्ची साधना के आधार हैं। साधना मनुष्य के भीतर छिपी दिव्य चेतना को जागृत कर उसे श्रेष्ठ जीवन की ओर ले जाती है।
इस अवसर पर इंद्रदेव शर्मा, डॉ. धर्मेंद्र कुमार तिवारी, डॉ. त्रिवेणी सिंह, सुधा गुप्ता, शकुंतला पांडेय, अभिषेक गुप्ता, सुधीर कुमार सिंह, सुनील श्रीवास्तव, शीला जायसवाल सहित अन्य साधक उपस्थित रहे।

